हे रोम रोम मे बसने वाले राम, जगत के स्वामी

हे रोम रोम मे बसने वाले राम,
जगत के स्वामी, हे अन्तर्यामी, मे तुझ से क्या मांगूं।

◾️ आप का बंधन तोड़ चुकी हूं, तुझ पर सब कुछ छोड़ चुकी हूं।
नाथ मेरे मै क्यूं कुछ सोचूं तू जाने तेरा काम॥

◾️ तेरे चरण की धुल जो पायें, वो कंकर हीरा हो जाएँ।
भाग मेरे जो मैंने पाया, इन चरणों मे ध्यान॥

◾️ भेद तेरा कोई क्या पहचाने, जो तुझ सा को वो तुझे जाने।
तेरे किये को हम क्या देवे, भले बुरे का नाम॥

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