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बैठ अकेला दो घडी, कभी ईश्वर तो ध्याया कर,

बैठ अकेला दो घडी, कभी ईश्वर तो ध्याया कर, मन मंदिर में गाफ़िला, तूं झाड़ू रोज लगाया कर। सोने में तो रेन गंवाई, दिन भर करता पाप रहा मोह माया में फंस कर बन्दे, धोखे में तूँ आप रहा सुबह सवेरे उठ प्रेमिया, सत्संग में नित आया कर मन मंदिर में… बारम्बार जन्म का पाना,

सतगुरु मैं तेरी पतंग, हवा विच उडदी जावांगी…

सतगुरु मैं तेरी पतंग, हवा विच उडदी जावांगी, हवा विच उडदी जावांगी। साईयां डोर हाथों छोड़ी ना, मैं कट्टी जावांगी॥ तेरे चरना दी धूलि साईं माथे उते लावां, करा मंगल साईंनाथ गुण तेरे गावां। साईं भक्ति पतंग वाली डोर, अम्बरा विच उडदी फिरा॥ बड़ी मुश्किल दे नाल मिलेय मेनू तेरा दवारा है। मेनू इको तेरा

श्री परशुराम चालीसा – श्री गुरु चरण सरोज छवि,

॥दोहा॥ श्री गुरु चरण सरोज छवि, निज मन मन्दिर धारि। सुमरि गजानन शारदा, गहि आशिष त्रिपुरारि॥ बुद्धिहीन जन जानिये, अवगुणों का भण्डार। बरणौं परशुराम सुयश, निज मति के अनुसार॥ ॥चौपाई॥ जय प्रभु परशुराम सुख सागर, जय मुनीश गुण ज्ञान दिवाकर। भृगुकुल मुकुट बिकट रणधीरा, क्षत्रिय तेज मुख संत शरीरा॥ जमदग्नी सुत रेणुका जाया, तेज प्रताप

श्री नवग्रह चालीसा – श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय।

‘श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय। नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय॥ जय जय रवि शशि सोम बुध जय गुरु भृगु शनि राज। जयति राहु अरु केतु ग्रह करहुं अनुग्रह आज॥ ॥चौपाई॥ ॥श्री सूर्य स्तुति॥ प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा, करहुं कृपा जनि जानि अनाथा। हे आदित्य दिवाकर भानू, मैं मति मन्द महा अज्ञानू।

श्री रविदास चालीसा – बन्दौ वीणा पाणि को,

॥दोहा॥ बन्दौ वीणा पाणि को, देहु आय मोहिं ज्ञान। पाय बुद्धि रविदास को, करौं चरित्र बखान॥ मातु की महिमा अमित है, लिखि न सकत है दास। ताते आयों शरण में, पुरवहुं जन की आस॥ ॥चौपाई॥ जै होवै रविदास तुम्हारी, कृपा करहु हरिजन हितकारी। राहू भक्त तुम्हारे ताता, कर्मा नाम तुम्हारी माता॥ काशी ढिंग माडुर स्थाना,

श्री पितर चालीसा – हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद,

॥दोहा॥ हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद, चरणाशीश नवा दियो रखदो सिर पर हाथ॥ सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी। हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी॥ ॥चौपाई॥ पितरेश्वर करो मार्ग उजागर, चरण रज की मुक्ति सागर। परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा, मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा॥ मातृ-पितृ देव मन जो

श्री रामदेव चालीसा – श्री गुरु पद नमन करि,

॥दोहा॥ श्री गुरु पद नमन करि, गिरा गनेश मनाय। कथूं रामदेव विमल यश, सुने पाप विनशाय॥ द्वार केश से आय कर, लिया मनुज अवतार। अजमल गेह बधावणा, जग में जय जयकार॥ ॥चौपाई॥ जय जय रामदेव सुर राया, अजमल पुत्र अनोखी माया। विष्णु रूप सुर नर के स्वामी, परम प्रतापी अन्तर्यामी। ले अवतार अवनि पर आये,

तुलसी माता चालीसा – जय जय तुलसी भगवती सत्यवती,

॥दोहा॥ जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी। नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी॥ श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब। जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब॥ ॥चौपाई॥ धन्य धन्य श्री तलसी माता। महिमा अगम सदा श्रुति गाता॥ हरि के प्राणहु से तुम प्यारी। हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी॥ जब प्रसन्न है

श्री बगलामुखी चालीसा – सिर नवाइ बगलामुखी, लिखूं चालीसा आज॥

॥दोहा॥ सिर नवाइ बगलामुखी, लिखूं चालीसा आज॥ कृपा करहु मोपर सदा, पूरन हो मम काज॥ ॥चौपाई॥ जय जय जय श्री बगला माता। आदिशक्ति सब जग की त्राता॥ बगला सम तब आनन माता। एहि ते भयउ नाम विख्याता॥ शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी। असतुति करहिं देव नर-नारी॥ पीतवसन तन पर तव राजै। हाथहिं मुद्गर गदा विराजै॥

भैरव चालीसा – श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ।

॥दोहा॥ श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ। चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ॥ श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल। श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥ जय जय श्री काली के लाला। जयति जयति काशी- कुतवाला॥ जयति बटुक- भैरव भय हारी। जयति काल- भैरव बलकारी॥ जयति नाथ- भैरव विख्याता। जयति सर्व-